लेखांकन की शब्दावली ( Basic Terminology of Accounting in Hindi )

लेखांकन की शब्दावली ( Terminology of Accounting )

Basic Accounting terms in Hindi

लेखांकन की शब्दावली ( Basic Terminology of Accounting in  Hindi   ) इसकी पूरी जानकारी मैं आर्टिकल में देने वाला हूं।
 
लेखांकन के अन्तर्गत कुछ विशिष्ट शब्दों का प्रयोग किया जाता है । Accounting विषय से सम्बन्धित इन शब्दों का विशेष अर्थ होता है ,। प्रमुख पारिभाषिक शब्द निम्न हैं जो accounting 
में उपयोग किये जाते है 

1. व्यवसाय ( Business ) - ऐसा कोई वैधानिक कार्य जो आय या लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से किया गया हो , व्यवसाय कहलाता है । ' व्यवसाय ' एक व्यापक शब्द है , जिसके अन्तर्गत व्यापार , उत्पादन कार्य , वस्तुओं या सेवाओं का क्रय - विक्रय आदि आते हैं ।
 
2 . व्यापार ( Trade ) - लाभ कमाने के उद्देश्य से किया गया वस्तुओं का क्रय - विक्रय व्यापार कहलाता है ।
 
3. पेशा या वृत्ति ( Profession ) - आय अर्जित करने के लिये किया गया कोई कार्य या साधन , जिसके लिये पूर्व प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है , को पेशा या वृत्ति कहते हैं । डॉक्टर , वकील , शिक्षक , इंजीनियर आदि द्वारा किये जाने वाले कार्य को पेशा कहते हैं ।
 
4. व्यावसायिक सौदे ( Business Transactions ) - दो पक्षों के मध्य होने वाले मुद्रा , माल या सेवा के पारस्परिक विनिमय को व्यावसायिक सौदे या लेन - देन कहते हैं । माल का क्रय - विक्रय , भुगतान का  देना  या लेना आदि आर्थिक क्रियाएँ व्यावसायिक सौदे कहलाते हैं । 

ये सौदे व्यवसाय व्यवस्था में तीन प्रकार से प्रचलित हैं
 
( i ) नकद व्यवहार ( Cash Transaction ) - यदि लेन - देन नकद अथवा बैंक के माध्यम से तत्काल किया जाता है तो यह नकद व्यवहार कहलाता है । जैसे- नकदी माल खरीदना , या नकदी माल खरीद कर वैन से भुगतान करना आदि ।

( ii) उधार या साख व्यवहार ( Credit Transaction ) - जिन सौदों का भुगतान तुरन्त न किया जाकर कुछ या नियत समय के बाद किया जाता है तो ऐसे व्यवहार उधार या साख ( Credit ) व्यवहार कहलाते हैं । जैसे- अशोक को एक माह की उधारी पर बेचा गया माल उधार व्यवहार है ।
 
( iii ) विपत्र व्यवहार ( Bill Transactions ) - जब माल का क्रय - विक्रय विनिमय विपत्र ( Bills of Exchange ) के माध्यम से होता है तो ऐसे व्यवहार को विपत्र व्यवहार कहते हैं । 
 
5. स्वामी ( Proprietor ) - व्यवसाय को प्रारम्भ करने वाला व्यक्ति जो आवश्यक पूँजी की व्यवस्था करता है तथा लाभ प्राप्त करने का अधिकारी व हानि की जोखिम वहन करता है , व्यवसाय का स्वामी कहलाता है । अलग - अलग व्यवसायों में स्वामी संगठन की प्रकृति या प्रकार पर निर्भर करते हैं ।
 
6. पूंजी ( Capital ) - व्यवसाय के स्वामी द्वारा व्यवसाय को प्रारम्भ करने के लिये जो धन , रोकड़ या अन्य सम्पत्ति के रूप में लगाया जाता है , उसे पूंजी कहते हैं । व्यवसाय में पूँजी लाभार्जन के उद्देश्य से लगाई जाती है । लाभ का वह भाग जो व्यवसाय से निकाला नहीं गया है , पूंजी में वृद्धि करता है । अन्य शब्दों में , सम्पत्तियों का दायित्व पर आधिक्य पूँजी कहलाता है ।

पूँजी = सम्पत्तियाँ - दायित्व 
Capital = Assets - Liabilities

7. आहरण Drawings ) - व्यवसाय के स्वामी द्वारा व्यवसाय से निजी उपयोग के लिये जो माल रोकड़ निकाल लिये जाते हैं , उसे आहरण या निजी व्यय कहते हैं । आहरण से पूँजी की मात्रा कम जाती है ।
 
8. माल ( Goods ) - माल उस वस्तु को कहते हैं , जिसका क्रय - विक्रय या व्यापार किया जाता है माल के अन्तर्गत वस्तुओं के निर्माण हेतु प्राप्त कच्ची सामग्री अर्द्धनिर्मित सामग्री Work in Progress ) तैयार वस्तुएँ ( Finished Goods ) हो सकती हैं । लेखांकन के अन्तर्गत माल ( Goods को क्रय , विक्रय , क्रय वापसी , विक्रय वापसी या रहतिया के रूप में लिखा जाता है ।
 
9. क्रय ( Purchases ) - जब व्यापारी द्वारा विक्रय हेतु माल की खरीदी की जाती है , तो उसे क्रय कहा जाता है । यह खरीदी कच्ची सामग्री या तैयार माल के रूप में हो सकती है । सम्पत्तियों का क्रय , क्रय में शामिल नहीं है , क्योंकि ये पुनः विक्रय के लिये नहीं होती हैं ।
 
10. विक्रय ( Sales ) - लाभ प्राप्ति के उद्देश्य से जब क्रय किया हुआ माल बेचा जाता है , उसे विक्रय कहते हैं । नकद माल बेचने को नकद विक्रय ( Cash Sales ) तथा उधार माल बेचने को उधार विक्रय ( Credit Sales ) कहते हैं । 

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11. क्रय वापसी ( Purchases Return ) - क्रय किये गये माल में से किसी कारणवश जो माल वापस कर दिया जाता है , उसे क्रय वापसी अथवा बाह्य वापसी ( Rerum Outward ) कहते हैं ।
 
12. विक्रय वापसी ( Sales Returm ) - विक्रय किये गये माल में जो भाल किसी कारणवश ग्राहक द्वारा वापस कर दिया जाता है , उसे विक्रय वापसी अथवा आन्तरिक वापसी ( Return Inward कहते हैं ।
 
13. रहतिया या स्कन्ध ( Stock ) - एक निश्चित समयावधि के उपरान्त जो माल बिकने से रह जाता है उसे रहतिया ( Stock ) कहते हैं । किसी व्यापारिक वर्ष के अन्तिम दिन जो बिना बिका ( Un - sold ) माल रह जाता है उसे अन्तिम रहतिया ( Closing Stock ) कहते हैं । नवीन व्यापारिक वर्ष के प्रारम्भ में यही रहतिया , प्रारम्भिक रहतिया ( Opening Stock ) कहलाता है ।
 
14. सम्पत्तियाँ ( Assets ) - व्यवसाय के वे सभी संसाधन जिनका वित्तीय मूल्य होता है तथा जो व्यवसाय को चलाने के लिये आवश्यक होते हैं एवं जिन पर व्यवसायी का स्वामित्व होता है , सम्पत्तियाँ कहलाते हैं । 

ये संसाधन दो श्रेणियों में वर्गीकृत किए गए हैं 
( अ ) स्थायी सम्पत्ति ( Fixed Assets ) , 
( ब ) चालू सम्पत्ति ( Current Assets ) | 

( अ ) स्थायी सम्पत्ति ( Fixed Assets ) - स्थायी सम्पत्तियाँ वे सम्पत्तियाँ होती हैं जिनका दीर्घ जीवन होता है । ये विक्रय के उद्देश्य से नहीं अपितु व्यापार में निरन्तर प्रयोग के उद्देश्य से खरीदी जाती है । भूमि , भवन , फर्नीचर , उपकरण , मोटर आदि सम्पत्तियाँ इसी श्रेणी में आती है । इन्हें पूँजीगत सम्पत्ति या गैर - चालू सम्पत्ति 

( ब ) चालू सम्पत्ति ( Current Assets ) - ये वे सम्पत्तियाँ है जो स्थायी रूप से व्यापार में नहीं रहती है । इन्हें बिक्री के उद्देश्य से खरीदा जाता है अथवा रोकड़ में परिवर्तन करने के उद्देश्य से रखा जाता है । जैसे रहतिया , देनदार , प्राप्य विपत्र , बैंक में जमा , स्टोर्स तथा अन्य व्यापारिक वस्तुएँ । 

15. दायित्व या देयताएँ ( Liabilities ) - व्यवसाय में कुछ राशियाँ ऐसी होती हैं , जिन्हें चुकाने का दायित्व व्यवसाय पर होता है । व्यवसाय के ऐसे देय धन को दायित्व या देयताएँ कहते हैं । 

व्यापारिक दायित्व दो प्रकार के होते हैं- 

( अ ) दीर्घकालीन दायित्व या स्थायी दायित्व ( Long Term Liabilities or Fixed LI abilities ) 
( ब ) अल्पकालीन दायित्व या चालू दायित्व ( Short Tem Liabilities or Current Liabilities ) 

( अ ) दीर्घकालीन दायित्व- ऐसी देनदारियाँ जिनका भुगतान दीर्घकाल के पश्चात् ( सामान्यतः एक वर्ष के बाद ) करना हो , स्थायी दायित्व कहलाते हैं । जैसे- दीर्घकालीन ऋष्ण ( Long Term Loan ) , पूँजी ( Capital ) , ऋणपत्र ( Debenture ) आदि ।

( ब ) अल्पकालीन दायित्व- ये वे दायित्व होते हैं , जिनका एक वर्ष में भुगतान करना होता है । जैसे लेनदार , देय विपत्र , बैंक ऋष्ण , बैंक अधिविकर्ष या अन्य अल्पकालीन ऋण । 

16. आगम ( Revenue ) - आगम से आशय ऐसी राशि से है , जो माल अथवा सेवाओं के विक्रय से नियमित रूप से प्राप्त होती है । व्यवसाय के दिन - प्रतिदिन के क्रिया - कलापों से प्राप्त होने वाली राशियाँ जैसे- किराया , व्याज , कमीशन , बट्टा , लाभांश आदि भी आगम कहलाते हैं । 


17. व्यय ( Expenses ) - व्यवसाय में माल , वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन या प्राप्ति करने के लिये जो लागत ( Cost ) आती है , उसे व्यय कहा जाता है । माल तथा सेवाओं की प्राप्ति के लिये भुगतान , व्यय के अन्तर्गत आता है
। मजदूरी , भाड़ा , रेलभाड़ा तथा माल के वितरण एवं विक्रय पर भुगतान किया गया वेतन , किराया , विज्ञापन व्यय , बीमा आदि भी व्यय में शामिल हैं । 

18. खर्च ( Expenditure ) - खर्च वह राशि होती है , जो व्यवसाय की लाभ - अर्जन क्षमता की वृद्धि हेतु भुगतान की जाती है । खर्च लम्बी अवधि की प्रकृति से सम्बन्धित है । व्यवसाय में सम्पत्तियों के अधिग्रहण या प्राप्ति ( Aquire ) हेतु जो भुगतान किया जाता है , वह खर्च ( Expenditure ) कहलाता है । 

19. आय ( Income ) - वह राशि जिससे व्यापार की पूँजी में वृद्धि हो , आय कहलाती है । इस राशि को ज्ञात करने के लिये आगम ( Revenue ) में से व्यय घटा दिये जाते हैं । जो शेष बचता है , वह आय की गयी होती है । उदाहरण के लिये , यदि आगम 25,000 रुपये हो और व्यय 12,000 रुपये हो तो आय 13,000 होगी । ' आय ' एक व्यापक शब्द है , इसमें लाभ ( Profit ) भी शामिल रहता है । 

सूत्र के रूप में 
आय = आगम - व्यय 

20. हानि ( Loss ) - जब व्यय आगम से अधिक होते हैं तो व्यय का आधिक्य हानि कहलाता है , जो कि पूँजी में कमी करता है । इसे व्यापारिक दृष्टि से सामान्य हानि समझा जाता है , जबकि आग , चोरी , बाढ, दुर्घटना से होने वाली हानि को असामान्य हानि ( Abnormal Loss ) कहा जाता है । 

21. लाभ ( Gain ) - यह एक प्रकार की मौद्रिक प्राप्ति है , जो व्यवसाय के व्यवहार के फलस्थान प्राप्त होती है , जैसे- यदि 1,50,000 रुपये मूल्य की सम्पत्ति को 2,00,000 रुपये में बेचा जाएगा 50,000 रुपये की प्राप्ति लाभ ( Gain ) कहलायेगी ।

22. लागत ( Cost ) - व्यवसाय एवं उसके कार्यों में प्रयोग होने वाले कच्चे माल ( Raw material ) , सेवा व श्रम के उत्यादन या उसे उपयोगी बनाने हेतु किये जाने वाले समस्त प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष व्ययों के योग को ही वस्तु या सेवा की लागत कहते हैं । वस्तु के अन्तर्गत कच्चा माल या सम्पत्तियाँ शामिल रहती हैं ।

23. कटौती , बट्टा या छूट ( Discount ) - व्यापारी द्वारा अपने ग्राहकों को दी जाने वाली रियायत को कटौती , बट्टा , छूट या अपहार कहते हैं । बट्टा दो प्रकार का होता है
 
( a ) व्यापारिक बट्टा ( Trade Discount ) - विक्रेता अपने ग्राहकों को माल खरीदते समय उसके अंकित मूल्य में जो रियायत करता है , उसे व्यापारिक बट्टा कहते हैं । 

( b) नकद बट्टा ( Cash Discount ) -
निर्धारित अवधि में नकद राशि या चैक द्वारा मूल्य का भुगतान करने पर ऋणी को जो रियायत दी जाती है , उसे नकद बट्टा कहते हैं । 

24. ऋणी या देनदार ( Debtor ) - जो व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति था व्यापारिक फर्म से माल अथवा सेवाएँ उधार लेता है , उसे व्यापार का ऋणी या देनदार कहते हैं । ऋणी का स्थान ऋणदाता से अधम होता है , इसलिए इसे अधमर्ण भी कहते हैं । ऐसे ऋण की कुल राशि को ' खाता ऋण ' ( Book Debts ) और त्राणियों या देनदारों को ' विविध ऋणी ' ( Sundry Debtors ) कहते हैं ।

25 , ऋणदाता या लेनद्वार ( Creditor ) - जिस व्यक्ति या व्यापारिक फर्म से माल अथवा सेवाएं उधार ली जाती है , उसे प्राणदाता या लेनदार कहते हैं । ऋणदाता का ऋणी से उत्तम स्थान होता है , इसलिए इसे उत्तमर्ण भी कहते हैं । व्यापार के ऋणदाताओं को समग्र रूप में ' विविध ऋणदाता या लेनदार ' ( Sundry Creditors ) कहते हैं ।
 
26. प्राप्य ( Receivables ) - व्यवसाय से सम्बन्धित ऐसी राशि जिसको प्राप्त किया जाना है , उसे प्राप्य कहते हैं । व्यापार में माल की उधार बिक्री होने पर क्रेता को देनदार कहा जाता है , जिनसे राशि प्राप्त की जाना होती है । यदि क्रेता द्वारा विपत्र ( Bill ) स्वीकार कर लिया जाता है , तो इसे प्राप्य विपत्र ( Bill  Receivable ) कहते हैं । इस प्रकार देनदार तथा प्राप्य विपत्र की राशि को प्राप्य ( Receivables ) कहा जाता है ।
 
27. देयताएँ ( Payables ) - व्यवसाय में कुछ ऐसी राशियाँ होती हैं जिन्हें भविष्य में व्यापारी को चुकाना होता है , उन्हें देयताएँ ( Payables ) कहते हैं । जिनसे व्यापार द्वारा उधार माल क्रय किया जाता है , वे व्यापार के लेनदार ( Creditors ) कहलाते हैं । यदि विक्रेता द्वारा लिखित विपत्र क्रेता द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है , तो इसे देय विपत्र ( Bills Payables ) कहते हैं । इस प्रकार व्यापार के लेनदार एवं देय विपत्र देयताएँ ( Payables ) कहलाते हैं ।
 
28. आस्थगित आगम व्यय ( Deffered Revenue Expenditures ) - कभी - कभी व्यवसाय में एक बड़ी धन राशि व्यय की जाती है , जिसका लाभ उसी वर्ष प्राप्त न होकर आगामी कई वर्षों तक प्राप्त होता रहता है । 

इन व्ययों का एक ही वर्ष में अपलेखन स्थगित कर कुछ वर्षों में समान अंशों में बाँट दिया जाता है , अर्थात् व्यय का एक भाग लाभ - हानि खाते में डेबिट किया जाता है और शेष राशि चिठे ( Balance Sheet ) के सम्पत्ति पक्ष में तब तक दर्शायी जाती है , 

जब तक कि वह पूर्णतः लाभ - हानि खाते में अपलिखित न कर दी जाए । लाभ - हानि खाते में लिखने से स्थगित करने के कारण ही ऐसे आगम व्यय को आस्थगित आगम व्यय ( Differed Revenue Expenditure ) कहते हैं ।
 
29. प्रविष्टि ( Entry ) - लेन - देन को हिसाब की पुस्तकों में लिखना ' प्रविष्टि करना ' कहलाता है और उसके लिपिबद्ध स्वरूप को ' प्रविष्टि ' कहते हैं ।

30. कुल बिक्री या आवर्त ( Turn - over ) - एक निश्चित अवधि में होने वाला नकद तथा उभार विक्रय का योग कुल विक्रय कहलाता है । इसे ' आवर्त ' भी कहा जाता है । जैसे - 5 लाख रुपये का विक्रय नकद और 6  लाख रुपये का विक्रय उधार हुआ है तो कुल बिक्री 11 लाख रुपये की होगी
 
31. दिवालिया ( Insolvent ) - जो व्यक्ति अपना ऋण चुकाने में असमर्थ हो जाता है , उसे दिवालिया कहते हैं । ऐसे व्यक्ति का दायित्व उसकी सम्पत्ति के मूल्य से अधिक होता है । ऐसी स्थिति में वह अपना ऋाण पूरी मात्रा में नहीं चुका सकता । आंशिक रूप में ब्राण चुकता करने के लिए उसे न्यायालय की हाण लेनी पड़ती है । 

न्यायालय उसे दिवालिया घोषित कर आंशिक रूप से ऋण चुकाने की अनुमति दे देता जिससे वह अपने ऋण से मुक्त हो जाता है ।

32. डूबत या अप्राप्य ऋण ( Bad Debts ) - ऋाणी के दिवालिया हो जाने के कारण जो रकम वसूल नहीं हो पाती , वह लेनदार के लिए ड्बत त्राण या अप्राप्य ऋण कहलाती है ।

33. प्रमाणक ( Voucher ) - लेन - देन को प्रमाणित करने वाले लिखित पत्र को प्रमाणक कहते हैं । बीजक , रकम भुगतान की रसीद , बैंक व्यवहार की पर्चियां आदि प्रमाणक कहलाते हैं । लेन - देन की प्रविष्टि करते समय पुस्तकों में इनका हवाला दिया जाता है । 

34. खाता ( Account ) - किसी व्यक्ति , फर्म , वस्तु , सम्पत्ति या आव - व्यय से सम्बन्धित सभी व्यवहारों को छाँटकर जो पृथक - पृथक सूची बनाई जाती है , उसे खाता कहते हैं । प्रत्येक खाता एक तालिका के रूप में दो पक्षों में बँटा रहता है । बायें पक्ष को नाम या डेबिट तथा दाहिने पक्ष को जमा या क्रेडिट कहते हैं । खाता का अंग्रेजी संक्षिप्त रूप Ne होता है ।

35.नाम और जमा ( Debit and Credit ) - प्रत्येक खाते के दो पक्ष होते हैं । बाएँ पक्ष को नाम या विकलन ( Debit ) तथा दाहिने पक्ष को जमा या समाकलन ( Credit ) कहते हैं । 

किसी खाते के बाएँ पक्ष में लेखा करना ' नाम लेखा ' ( Debit Record ) कहलाता है , जिसे परम्परागत रूप में संक्षेप में Dr. लिखते हैं । 

इसी प्रकार खाते के दाहिने पक्ष में लेखा करना ' जमा लेखा ' ( Credit Record ) कहलाता है , जिसे परम्परागत रूप में संक्षेप में ' Cr. लिखते हैं । यह उल्लेखनीय है कि भारतीय बहीखाता प्रणाली में नाम पक्ष दाहिनी ओर तथा जमा पक्ष बाथी ओर होता है ।
 
36. वित्तीय घटनाएँ ( Financial Events ) - व्यापार में ऐसे अवसर भी आते हैं , जिनके फलस्वरूप व्यापार की सम्पत्तियों , माल तथा सेवाओं के मूल्यों में परिवर्तन हो जाता है । इन अवसरों को ही वित्तीय घटनाएँ कहते हैं , जैसे- सम्पत्तियों के मूल्य में हास या वृद्धि , अदत्त वेतन , स्कंध का मूल्य बाजार में गिर जाना , आग या चोरी से हानि आदि 

37. स्टोर्स ( Stores ) - वे वस्तुएँ जो व्यापार में ही प्रयोग के लिए होती हैं , स्टोर्स कहलाती है । इनका पुनः विक्रय नहीं होता है । जैसे- एक कारखाने में कोयला , ईधन सामग्री , पैकिंग का सामान , विभिन्न प्रकार के छोटे कलपुर्जे , मशीनों के रख - रखाव की सामग्री स्टोर्स में शामिल जाती है
 
38. कमीशन ( Commission ) - व्यापारिक कार्यों में सहयोग करने अथवा प्रतिनिधि ( एजेण्ट ) के रूप में सेवाएं देने पर जो पारिश्रमिक सहयोगी को दिया जाता है , उसे  कमीशन कहते है । कमीशन कई प्रकार का होता है , जो कि विभिन्न आधारों पर दिया जाता है
 
39. आगमगत ( Revenue ) - इस प्रकार की मर्दे जो आवर्तक ( Recurring ) स्वभाव की होती है , जो व्यवसाय के सामान्य संचालन से सम्बन्धित क्रियाएँ जैसे- क्रय - विक्रय तथा ब्याज , कमीशन , बट्टा , लाभांश आदि के रूप में होती हैं , आगमगत या आगम मदें कहलाती है । इनका लाभ चालू वित्तीय वर्ष में ही प्राप्त होता है ।

40. पूँजीगत ( Capital ) - इस प्रकार की मदें जो अनावर्तक ( Non - Recurring  ) स्वभाव की होती है तथा जो व्यवसाय के लाभ को स्थायी रूप से प्रभावित करती हैं , पूँजीगत मदें कहलाती है । इनसे व्यवसाय की लाभार्जन शक्ति में वृद्धि होती है । जैसे- भूमि , भवन , फर्नीचर आदि ।
 
41. फर्म ( Firm ) - सामान्य अर्थ में फर्म से आशय उस संस्था से है , जो कि साझेदारी स्थापित कर व्यापारिक या व्यावसायिक कार्य करती है , किन्तु व्यापक अर्थ में प्रत्येक व्यापारिक इकाई को फर्म के नाम से सम्बोधित किया जा सकता है ।
 
42. जीवित स्टॉक ( Live Stock ) - व्यापारिक कार्यों में जिस पशुधन का उपयोग किया जाता है , उसे जीवित स्टॉक कहते हैं । जैसे- गाय , बैल , भैंस , घोड़े , ऊँट आदि ।

43. मृत स्टॉक ( Dead Stock ) - व्यापार में प्रयोग की जाने वाली भौतिक सम्पत्तियों को मृत स्टॉक कहते हैं । जैसे- यंत्र , फर्नीचर , भवन , कम्प्यूटर आदि । ।

मैं उम्मीद करता हूं कि आप जान गए होंगे कि लेखांकन की शब्दावली ( Terminology of Accounting ) के बारे में , तथा Basic Accounting terms in Hindi  के बारे में । यदि आपको यह आर्टिकल अच्छा लगा तो हमें कमेंट के माध्यम से जरूर बताएं ।
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